भगवान महावीर के बताए मार्ग पर चलने वाली आत्मा ही वास्तविकता को जान सकती है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

धमतरी। ईतवारी बाजार स्थित पाश्र्वनाथ जिनालय में चातुर्मास के तहत रोजाना प्रवचन जारी है। जिसके तहत आज परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आज हमें जीवन के रहस्य को जानना और समझना है कि मैं कौन हूँ? वास्तव में जिस हाड़ मांस के शरीर को अपना मानते है क्या वो सच में मेरा है? परमात्मा कहते है शरीर में सुख और दुख की अनुभूति खोजने वाला अज्ञानी होता है जबकि आत्मा में सुख दुख खोजने वाला ज्ञानी होता है। हम हर भव में पाप करते आए है। पाप का फल दुर्गति, दुख और अशांति के रूप में आने वाले भव में प्राप्त होता है। हमें विचार करना है कि क्या हमने पाप कार्य छोड़ दिया है? अगर नहीं छोड़ा है तो चिंतन कीजिए आने वाले वाले भव में उस पाप कर्म का कैसा फल मिलेगा? पाप को छोडऩा बहुत सरल है लेकिन आवश्यकता है उचित पुरुषार्थ करने की। ज्ञानियों का कहना है कि सुख दुख का कारण इच्छा है। इच्छा होती है और वह पूरी नहीं हो तो वह दुख का कारण बन जाता है। किंतु अगर इच्छाओं को कम कर ले या रोक ले तो उसके पूरी होने या न होने का प्रश्न ही नहीं होगा। भगवान महावीर का मार्ग सत्य और शांति का मार्ग है। महावीर के बताए मार्ग पर चलने वाला आत्मा की वास्तविकता को जान सकता है। और आत्मा को जानने वाला ही आत्मविकास कर सकता है। जिस प्रकार ईमानदारी, भूख, सुख और दुख दिखाई नहीं देता इसकी केवल अनुभूति होती है उसी प्रकार आत्मा भी दिखाई नहीं देती इसकी केवल अनुभूति होती है। ज्ञानियों का कहना है हम जीवन में दो प्रकार का कार्य कर सकते है। भोग का और योग का। भोग के लिए तन, धन और स्वजन तीनों की जरूरत होती है। तीनों में से एक की कमी हो जाए तो भोग संभव नहीं है।और भोग का मार्ग आत्मा के पतन का मार्ग है। जबकि योग के लिए हमें सदगुरु की जरूरत होती है जो आत्मा का साक्षात्कार करा सके। हमें आत्मविकास का मार्ग बता सके। जो हमें शरीर और आत्मा का भेद बता सके।

