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इच्छा खत्म होते ही जीव सर्व दुखो से मुक्त हो जाता है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.

23वें तीर्थंकर परमात्मा पाश्र्वनाथ भगवान के निर्वाण कल्याणक पर उनके जीवन का किया गया उल्लेख


धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि आज 23वें तीर्थंकर परमात्मा पाश्र्वनाथ भगवान का निर्वाण कल्याणक है। भगवान पाश्र्वनाथ को पुरुषादानी भी कहा जाता है। क्योंकि उन्होने 500 कल्याणको में भाग लिया था। 24 तीर्थंकरों में सबसे अधिक पुण्यशाली पाश्र्वनाथ परमात्मा थे। भगवान पाश्र्वनाथ परमात्मा के 108 नाम है। और 108 नाम के 108 तीर्थ भी है। धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार में भी परमात्मा पाश्र्वनाथ मूलनायक परमात्मा के रूप में विराजमान है। इस जिनालय को 100 साल से अधिक हो गया है। इसलिए यह जिनालय भी तीर्थ स्वरूप है। परमात्मा का जिस दिन जन्म होता है उसी दिन से निर्वाण के लिए पुरुषार्थ प्रारंभ हो जाता है। परमात्मा ने अपने जीवन की परीक्षा पास कर ली। आज के दिन ही परमात्मा का निर्वाण हो गया। परमात्मा केवलज्ञान प्राप्त करते ही सभी मानसिक दुखों का नाश कर लेते है। और जैसे ही निर्वाण कल्याणक होता है वैसे ही शारिरिक दुखो का भी नाश हो जाता है। इसके बाद परमात्मा पुन: लौटकर इस नाशवान संसार में कभी नहीं आयेंगे। अर्थात परमात्मा जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो गए। परमात्मा के उचित पुरुषार्थ का फल निर्वाण रूपी पुरस्कार के रूप में मिलता है। सिद्ध बुद्ध होने वाला जीव इच्छा रहित हो जाता है। इच्छा ही दुख का कारण है। अर्थात इच्छा खत्म होते ही जीव सर्व दुखो से मुक्त हो जाता है। जब तक शरीर है तब तक रोग है। क्योंकि शरीर में ही रोग होता है। आत्मा तो निरोगी है। निर्वाण ही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है। निर्वाण पाने वाला जीव अखंड, अनंत सुख और आनंद को प्राप्त कर लेता है।

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