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हरियाली से खुशहाली तक सारंगपुरी में खस आधारित मिश्रित वृक्षारोपण से महिला सशक्तिकरण की मिसाल


धमतरी । धमतरी विकासखण्ड अंतर्गत ग्राम सारंगपुरी ने वर्ष 2024-25 में ग्रामीण आजीविका, पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण को साथ लेकर एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। मनरेगा एवं डीएमएफ मद के अभिसरण से स्वीकृत मिश्रित वृक्षारोपण कार्य ने गांव की बंजर होती भूमि को हरियाली में बदलने के साथ-साथ ग्रामीण परिवारों के लिए आय का नया स्रोत भी तैयार किया है। इस योजना की सबसे विशेष बात यह रही कि वृक्षारोपण के साथ खस जैसी औषधीय एवं आर्थिक महत्व की फसल को केंद्र में रखकर अंतरवर्तीय खेती अपनायी गई जिससे कम समय में लाभ प्राप्त हुआ। ग्राम पंचायत सारंगपुरी में लगभग 3.50 एकड़ भूमि पर मिश्रित वृक्षारोपण कार्य स्वीकृत हुआ। इस कार्य के लिए कुल 14.14 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई जिसमें मनरेगा से 6.27 लाख रुपये तथा डीएमएफ से 7.87 लाख रुपये। पंचायत ने योजना बनाते समय यह सुनिश्चित किया कि केवल पौधे रोपित न हों इस बात को ध्यान में रखते हुए भूमि का समुचित उपयोग करने, रोजगार सृजन हो तथा महिला समूहों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से किया गया। इसके लिए ग्रामसभा में चर्चा कर राधाकृष्ण स्व-सहायता समूह को योजना से जोड़ा गया। समूह में 14 महिलाएं शामिल हैं जिनका नेतृत्व समूह अध्यक्ष मधु यादव कर रही है। महिलाओं ने इस कार्य को जिम्मेदारीपूर्वक स्वीकार किया और पूरे उत्साह से इसे सफल बनाने का संकल्प लिया। भूमि पर एक ही प्रकार के पौधे लगाने के बजाय मिश्रित वृक्षारोपण मॉडल अपनाया गया जिससे पर्यावरणीय संतुलन बना रहे और भविष्य में विविध प्रकार की आय प्राप्त हो सके। कुल 860 पौधे रोपे गए और विशेष उपलब्धि यह रही कि वर्तमान में 860 पौधे जीवित हैं अर्थात शत-प्रतिशत जीवितता दर प्राप्त हुई। रोपित पौधों में आम, अमरुद, नीबू, कटहल, जामुन, करौंदा एवं सीताफल जैसे फलदार वृक्ष शामिल किए गए। इससे भविष्य में फल उत्पादन से दीर्घकालीन आय सुनिश्चित होगी। यह पौधे क्षेत्र को छायादार, हरा-भरा और जैव विविधता से समृद्ध बनाएंगे।
खस खेती ने पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को दी मजबूती
योजना की सबसे बड़ी सफलता रही कि वृक्षों के बीच खाली स्थान का उपयोग खस की खेती के लिए किया गया। खस एक बहुउपयोगी औषधीय पौधा है जिसकी जड़ें सुगंधित होती हैं तथा इनका उपयोग इत्र, शीतल पेय, औषधि, हर्बल उत्पाद, अगरबत्ती, मिट्टी संरक्षण और शीतल पर्दों में किया जाता है। ग्राम पंचायत ने समझा कि वृक्षों से आय प्राप्त होने में समय लगेगा इसलिए बीच के वर्षों में आय के लिए ऐसी फसल आवश्यक है जो कम लागत में अधिक लाभ दे। खस इसके लिए सर्वोत्तम विकल्प सिद्ध हुआ। इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती देती हैं, जल संरक्षण में सहायक होती हैं तथा भूमि कटाव रोकती हैं। इस प्रकार खस खेती ने पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूती दी। योजना के अंतर्गत केवल पौधारोपण तक सीमित न रहकर फेंसिंग कार्य और बोर खनन भी कराया गया। फेंसिंग से पशुओं से पौधों की सुरक्षा हुई तथा बोर खनन से सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हुई। जल उपलब्धता के कारण पौधों की देखरेख आसान हुई और खस सहित अन्य अंतरवर्तीय फसलें भी सफल रही। सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने से महिलाओं ने सब्जी उत्पादन भी प्रारंभ किया। बरबट्टी, बैगन, मिर्ची, प्याज भाजी जैसी फसलें लगाई गई जिससे घरेलू उपयोग के साथ अतिरिक्त आय भी प्राप्त हुई।
आर्थिक निर्णयों में भागीदारी कर रही हैं महिलाएं
राधाकृष्ण स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने इस योजना में श्रमदान, पौधों की सुरक्षा, सिंचाई, निराई-गुड़ाई और फसल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पहले जो महिलाएं केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थी आज वे आर्थिक निर्णयों में भागीदारी कर रही हैं। समूह की अध्यक्ष मधु यादव ने महिलाओं को संगठित कर नियमित बैठकें आयोजित की, कार्य विभाजन किया और आय-व्यय का लेखा-जोखा रखा। महिलाओं ने सामूहिक श्रम की शक्ति को समझा और यह सिद्ध किया कि यदि अवसर मिले तो ग्रामीण महिलाएं किसी भी योजना को सफल बना सकती है। इस वर्ष अंतरवर्तीय फसलों एवं खस आधारित गतिविधियों से समूह को लगभग 20, 000 रुपये की आय प्राप्त हुई। यह शुरुआत है। आने वाले वर्षों में जब खस की जड़ों का पूर्ण उत्पादन होगा और फलदार वृक्ष फल देना शुरु करेंगे तब आय कई गुना बढऩे की संभावना है। महिलाओं ने प्राप्त राशि का उपयोग समूह बचत, घरेलू आवश्यकताओं और बच्चों की शिक्षा में किया। इससे परिवारों में आत्मविश्वास बढ़ा और समूह की सामाजिक प्रतिष्ठा भी मजबूत हुई।

Ashish Kumar Jain

Editor In Chief Sankalp Bharat News

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