लगातार खेतों में जल रहे फसल अवशेष व पराली, आगजनी का बड़ा खतरा
पर्यावरण प्रदूषण के साथ ही मिट्टी की उपजाऊ क्षमता भी होती है प्रभावित
प्रशासन के बार-बार अपील के बाद भी बाज नहीं आ रहे हैं कुछ किसान लग सकता है 15 हजार तक जुर्माना

धमतरी। गर्मी के चौमासा में आगजनी की घटनाएं काफी बढ़ जाती है ऐसे में जान माल के नुकसान का खतरा भी काफी बढ़ जाता है। इस साल भी इस खतरे से लोग जूझ रहे हैं और उक्त खतरे को कुछ किसानो की लापरवाही कहीं ज्यादा बढ़ा देती है।
ज्ञात हो कि कई किसानों द्वारा खेतों में पराली या फसल अवशेष व झाडिय़ों को जला दिया जाता है इससे उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत कम हो गई है, लेकिन इसके कई नुकसान भी होते हैं बावजूद इसके कई किसान खेतों में आग लगने से बाज नहीं आते हैं। खेतों में आग लगाने के बाद आज हवा के साथ आसपास हुआ दूर तक भी फैलने का खतरा बना रहता है चूंकि गर्मी के मौसम में घास पत्ते झाडिय़ां आदि भी सुखे होते हैं, वर्षा होती नहीं है, ऐसे में हल्की सी चिंगारी भी बड़ी आगजनी का कारण बन जाती है। इसलिए खेतों में आग लगने से बचने की अपील प्रशासन द्वारा हर वर्ष किया जाता है, लेकिन इसका पालन नहीं हो पाता, इसलिए प्रशासन द्वारा खेतो में पराली जलाने वालों पर जुर्माना वसूलने का प्रावधान किया है। जिसके तहत जानकारी के अनुसार 0.80 हेक्टेयर तक भूमि वाले किसानों पर 2500 रुपये, 0.80 से 2.02 हेक्टेयर तक भूमि वाले किसानों पर 5000 रुपये और 2.02 हेक्टेयर से अधिक रकबे वाले किसानों पर 15 हजार रुपये तक का अर्थदंड लगाया जाएगा। पिछले कुछ दिनों में जिले के चारों विकासखंडों में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे आगजनी का खतरा भी बढ़ गया है। प्रशासन ने किसानों से अपील की है कि वे पराली जलाने के बजाय वैकल्पिक उपाय अपनाएं, जैसे कि फसल अवशेषों का उपयोग खाद निर्माण, पशु चारे या अन्य कृषि उपयोग में करना।
पराली जलाने उपजाऊ, उपरी परत को भारी नुकसान
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने से खेत की उपजाऊ ऊपरी परत को गंभीर नुकसान पहुंचता है। इससे मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं और भूमि की उर्वरक क्षमता कम हो जाती है। इसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ता है। एक टन पराली जलाने से लगभग 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फास्फोरस, 25 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर नष्ट हो जाता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती है और किसानों को आगे अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग करना पड़ता है।
पर्यावरण प्रदूषण का बनता है कारक
पराली जलाने से पर्यावरण को भी भारी नुकसान होता है। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है और आसपास के क्षेत्रों में धुएं की
