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चातुर्मास आत्मकल्याण का स्वर्णिम अवसर, धर्म आराधना से ही जीवन होगा सफल और सार्थक – पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.

श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में चातुर्मासिक चौदस से प्रतिदिन होंगे मंगल प्रवचन, 1 अगस्त से प्रारंभ होगा 36 दिवसीय गुरु इकतीस जाप


धमतरी। चातुर्मासिक चौदस के पावन अवसर पर इतवारी बाजार स्थित श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. आदि ठाणा-4 के मंगल सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों का शुभारंभ अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक वातावरण के बीच हुआ। जिनालय में प्रात:काल से ही श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति रही। नवकार मंत्र के सामूहिक जाप, गुरु वंदना एवं धर्म आराधना के साथ श्रद्धालुओं ने जिनवाणी का श्रवण कर अपने जीवन को धर्ममय बनाने का संकल्प लिया। पूरे जिनालय का वातावरण भक्ति, श्रद्धा और आत्मचिंतन की भावना से ओतप्रोत दिखाई दिया। प्रथम प्रवचन में पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि चातुर्मास केवल चार महीनों का धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण, आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण का अनुपम पर्व है। यह वह समय है जब प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है तथा धर्म, संयम, तप, त्याग और स्वाध्याय के माध्यम से स्वयं को श्रेष्ठ बनाने की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है, लेकिन यदि उसके जीवन में धर्म नहीं है तो वह वास्तविक सुख और शांति प्राप्त नहीं कर सकता। धन, वैभव और प्रतिष्ठा क्षणिक हैं, जबकि धर्म और सदाचार से अर्जित पुण्य जीवन के साथ-साथ आत्मा के अनंत भविष्य को भी प्रकाशित करते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में धर्म को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। पूज्यश्री ने कहा कि आज के समय में मनुष्य बाहरी चमक-दमक और भौतिक सुखों की दौड़ में इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने भीतर की आत्मा को ही भूल बैठा है। चातुर्मास हमें स्वयं से मिलने, अपने दोषों का निरीक्षण करने और उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है। जो व्यक्ति अपने क्रोध, मान, माया और लोभ पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, वही सच्चे अर्थों में धर्म का मार्ग अपनाता है। उन्होंने कहा कि धर्म केवल मंदिर में पूजा करने तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप हमारे व्यवहार, विचार और संस्कारों में दिखाई देना चाहिए। यदि हमारे जीवन में दया, क्षमा, विनम्रता, सत्य, अहिंसा, सेवा और सहनशीलता का समावेश हो जाए, तो वही सबसे बड़ी पूजा और सबसे बड़ी आराधना है। पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने समाजजनों से आह्वान किया कि चातुर्मास के इस अमूल्य समय का अधिकाधिक लाभ लें। प्रतिदिन प्रवचन सुनें, नवकार मंत्र का जाप करें, स्वाध्याय करें, सामायिक एवं प्रतिक्रमण जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लें तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य, विशेषकर बच्चों और युवाओं को धर्म से जोड़ें। आने वाली पीढिय़ों को धार्मिक संस्कार देना प्रत्येक परिवार का प्रथम कर्तव्य है। प्रवचन के पश्चात उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्म लाभ प्राप्त किया तथा पूज्यश्री के मंगल आशीर्वचन ग्रहण किए। आयोजन समिति द्वारा जानकारी दी गई कि प्रतिदिन प्रात: 8:45 बजे से 9:45 बजे तक पूज्यश्री के मंगल प्रवचन होंगे। वहीं 1 अगस्त 2026 से प्रतिदिन रात्रि 8:30 बजे से 9:30 बजे तक 36 दिवसीय गुरु इकतीस जाप का शुभारंभ किया जाएगा।

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