धर्म को जीवन का आधार बनाएं, तभी मिलेगा आत्मकल्याण : पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.

धमतरी। इतवारी बाजार स्थित पाश्र्वनाथाय जिनालय में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहब आदि ठाणा-4 के पावन सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला निरंतर जारी है। आज के प्रवचन में पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ या मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि धर्म हमारे जीवन जीने की श्रेष्ठ कला है। जब मनुष्य अपने विचारों, वाणी और आचरण को शुद्ध बनाता है, तभी उसके भीतर सच्चे धर्म का उदय होता है। धर्म मनुष्य को विनम्रता, संयम, सहनशीलता और आत्मविश्वास प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे इतना व्यस्त हो गया है कि उसने आत्मा की आवाज सुनना ही छोड़ दिया है। धन, वैभव और प्रतिष्ठा जीवन को सुविधाएं दे सकते हैं, लेकिन मन की शांति केवल धर्म और आत्मचिंतन से ही प्राप्त होती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय प्रभु भक्ति, नवकार मंत्र, स्वाध्याय और आत्म निरीक्षण के लिए निकालता है, उसका जीवन स्वत: ही आनंद और संतोष से भर जाता है। पूज्यश्री ने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। ये चार कषाय व्यक्ति के विवेक को नष्ट कर देते हैं और परिवार तथा समाज में अशांति का कारण बनते हैं। यदि इन कषायों पर विजय प्राप्त करनी है, तो क्षमा, विनम्रता, त्याग और संयम को जीवन में अपनाना होगा। जिसने स्वयं पर विजय प्राप्त कर ली, वही वास्तविक विजेता कहलाता है। उन्होंने समाज को जागृत करते हुए कहा कि आज आवश्यकता समाज को संगठित रखने और नई पीढ़ी को धर्म से जोडऩे की है। यदि बच्चों को बचपन से जिनवाणी, गुरु भगवंत, नवकार मंत्र, मंदिर और धार्मिक संस्कारों का वातावरण मिलेगा, तो वे जीवन में कभी गलत मार्ग पर नहीं जाएंगे। माता-पिता केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि संस्कार भी दें, क्योंकि संस्कार ही व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान होते हैं। पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि चातुर्मास आत्म परिवर्तन का महापर्व है। इस पावन काल में प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम एक बुराई छोडऩे और एक अच्छे गुण को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। जैन समाज की पहचान उसकी एकता, अनुशासन, सेवा भावना और अहिंसा के सिद्धांतों से है, इसलिए इन मूल्यों को सदैव जीवंत बनाए रखना हम सभी का दायित्व है। प्रवचन के अंत में पूज्यश्री ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि चातुर्मास के प्रत्येक दिन का सदुपयोग करें, नियमित रूप से प्रवचनों में उपस्थित हों, धर्म आराधना करें और अपने परिवार सहित अधिक से अधिक लोगों को जिनवाणी से जोडऩे का प्रयास करें। धर्म का एक छोटा-सा कदम भी आत्मकल्याण की दिशा में एक महान कदम होता है।

