जीवन बदलना है तो पहले अपनी सोच बदलें, धर्म ही मनुष्य का सच्चा पथप्रदर्शक है – पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.
कहा सत्य, संयम, क्षमा और सदाचार से ही आत्मा का विकास संभव, चातुर्मास को आत्मजागृति का महापर्व बनाएं

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के इतवारी बाजार स्थित श्री पाश्र्वनाथ जिनालय में परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मास का धार्मिक प्रवचन श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक वातावरण के बीच संपन्न हुआ। प्रात:काल से ही बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं जिनालय पहुंचीं और नवकार महामंत्र के जाप, गुरु वंदना तथा जिनवाणी श्रवण का लाभ प्राप्त किया। संपूर्ण जिनालय धर्ममय वातावरण से गुंजायमान रहा। अपने ओजस्वी एवं प्रेरणादायी प्रवचन में पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि मनुष्य अपने भाग्य से नहीं, बल्कि अपने विचारों, संस्कारों और कर्मों से महान बनता है। जीवन को बदलने के लिए परिस्थितियों को नहीं, बल्कि स्वयं की सोच और दृष्टिकोण को बदलना आवश्यक है। जब मन बदलता है, तब जीवन की दिशा भी बदल जाती है और आत्मा विकास की ओर अग्रसर होती है। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य के पास धन, साधन और सुविधाओं की कमी नहीं है, लेकिन मन की शांति का अभाव है। इसका कारण यह है कि उसने बाहरी दुनिया को तो जीतने का प्रयास किया, लेकिन अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ, ईष्र्या और मोह पर विजय पाने का प्रयास नहीं किया। जो व्यक्ति स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही सच्चा विजेता कहलाता है। पूज्यश्री ने कहा कि धर्म किसी विशेष दिन या स्थान तक सीमित नहीं है। धर्म तो प्रत्येक क्षण हमारे व्यवहार, हमारी वाणी और हमारे विचारों में दिखाई देना चाहिए। यदि हम किसी का दिल दुखाते हैं, कटु वचन बोलते हैं या छल-कपट का सहारा लेते हैं, तो केवल पूजा-पाठ करने से धर्म की पूर्णता नहीं होती। सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को विनम्र, सहनशील, दयालु और सत्यनिष्ठ बनाए। उन्होंने कहा कि चातुर्मास आत्मा का पर्व है। यह चार माह हमें अपने दोषों को देखने, उन्हें स्वीकार करने और उन्हें दूर करने का अवसर प्रदान करते हैं। प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन करें, अपने दिनभर के कार्यों का मूल्यांकन करें और यह सोचें कि आज हमने कितने पुण्य के कार्य किए तथा कितनों के जीवन में मुस्कान लाने का प्रयास किया। पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि समय सबसे बड़ा धन है। जो समय एक बार चला जाता है, वह कभी लौटकर नहीं आता। पूज्यश्री ने कहा कि क्षमा सबसे बड़ा आभूषण है। जो व्यक्ति क्षमा करना सीख जाता है, उसके जीवन से क्रोध, द्वेष और वैर अपने आप समाप्त हो जाते हैं। मनुष्य को दूसरों की गलतियों को पकडऩे के बजाय स्वयं को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
