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जो व्यक्ति अपने मन को नहीं जीत पाया उसके जीवन में वास्तविक शांति नहीं आ सकती- साध्वी रत्ननिधि श्री जी म. सा.

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पार्श्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी महाराज साहेब की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी महाराज साहेब की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचन श्रृंखला श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच निरंतर जारी है।
चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान साध्वी रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने क्रोध, क्षमा, संयम और आत्मशांति के विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी लड़ाई किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर चलने वाले क्रोध, अहंकार, लोभ और द्वेष से होती है। संसार में व्यक्ति अनेक प्रकार की सफलताएं प्राप्त कर ले, लेकिन यदि वह अपने मन को जीत नहीं पाया तो उसके जीवन में वास्तविक शांति नहीं आ सकती।
उन्होंने कहा कि क्रोध क्षणभर का होता है, लेकिन उसका परिणाम कई वर्षों तक रह सकता है। एक पल का गुस्सा वर्षों पुराने रिश्ते को तोड़ सकता है, एक कठोर शब्द किसी के मन को गहरा दुख दे सकता है और एक गलत निर्णय पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए जैन दर्शन हमें क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता और द्वेष के स्थान पर मैत्री का भाव रखने की प्रेरणा देता है।
क्रोध सबसे पहले स्वयं को जलाता है
साध्वीश्री ने कहा कि जब हम किसी व्यक्ति से क्रोधित होते हैं तो अक्सर हमें लगता है कि हम सामने वाले को सबक सिखा रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि क्रोध की आग सबसे पहले हमारे अपने मन को जलाती है। उन्होंने कहा कि मन में किसी के प्रति क्रोध रखकर हम दूसरे को नहीं, बल्कि स्वयं को कैद कर लेते हैं। इसलिए जीवन को हल्का और शांत बनाना है तो पुरानी बातों को छोड़ना सीखना होगा।
क्षमा करना कमजोरी नहीं, आत्मबल है
साध्वी रत्ननिधि श्री जी ने कहा कि क्षमा मांगना और क्षमा करना दोनों ही महान गुण हैं। कई बार मनुष्य सोचता है कि यदि मैंने किसी को माफ कर दिया तो मैं छोटा हो जाऊंगा, लेकिन वास्तव में क्षमा करने वाला व्यक्ति ही बड़ा होता है।
उन्होंने कहा कि जिसने हमारे साथ गलत किया, उसके प्रति भी मन में क्षमा का भाव रखना आसान नहीं है, लेकिन यही आत्मसंयम की परीक्षा है। दूसरे की गलती का बोझ अपने मन में लेकर जीवनभर चलने के बजाय उसे क्षमा करके आगे बढ़ जाना ही सच्ची विजय है।
साध्वीश्री ने कहा कि जैन धर्म में क्षमा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का मार्ग है। प्रवचन में साध्वीश्री ने वाणी के महत्व पर विशेष जोर देते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। तलवार से लगा घाव समय के साथ भर सकता है, लेकिन कठोर शब्दों से लगा घाव कई बार जीवनभर मन में रह जाता है।
इसलिए बोलने से पहले यह विचार करना चाहिए कि हमारे शब्द सामने वाले के मन को जोड़ेंगे या तोड़ेंगे।

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