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आचार्य श्री जिन पीयूषसागर सूरीश्वर जी म.सा. एवं नूतन आचार्य श्री जिन सम्यकरत्न सागर सूरीश्वर जी म.सा. का हुआ भव्य मंगल प्रवेश

संतो ने प्रवचन के माध्यम से कहा, मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हुए अपने वास्तविक धर्म और संस्कारों से दूर होता जा रहा है


धमतरी। खरतरगच्छ आचार्य परम पूज्य श्री जिन पीयूषसागर सूरीश्वर जी महाराज साहेब एवं नूतन आचार्य श्री जिन सम्यकरत्न सागर सूरीश्वर जी म.सा. आदि ठाणा-5 का बुधवार को धमतरी नगर में भव्य मंगल प्रवेश श्रद्धा, भक्ति एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।प्रात: सिहावा चौक स्थित संघवी नेमीचंद जी लक्ष्मीलाल जी लुनिया के निवास स्थान से मंगल प्रवेश यात्रा प्रारंभ हुई। नगर प्रवेश के दौरान जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं ने जयकारों, धर्म ध्वजाओं एवं गुरु वंदन के साथ संत भगवंतों का भव्य स्वागत किया। यात्रा सिहावा चौक से प्रारंभ होकर मकई चौक, गोल बाजार, कचहरी चौक, सदर बाजार होते हुए इतवारी बाजार स्थित श्री पाश्र्वनाथ जिनालय पहुंची, जहां मंगल प्रवेश यात्रा का समापन हुआ। नगर के विभिन्न स्थानों पर समाजजनों द्वारा पुष्प वर्षा कर संतों का अभिनंदन किया गया। पूरे मार्ग में धार्मिक एवं भक्तिमय वातावरण बना रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन मंगल प्रवेश यात्रा में शामिल होकर धर्म लाभ प्राप्त करते रहे। श्री पाश्र्वनाथ जिनालय पहुंचने के पश्चात साधु भगवंतों द्वारा आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए धर्म, संयम, तप, त्याग एवं आत्मकल्याण के महत्व पर विस्तृत एवं प्रेरणादायी प्रवचन प्रदान किया गया। प्रवचन में संतों ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हुए अपने वास्तविक धर्म और संस्कारों से दूर होता जा रहा है। जीवन में शांति, सद्भाव और आत्मिक आनंद तभी प्राप्त हो सकता है जब व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपने आचरण को शुद्ध बनाए। उन्होंने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय मनुष्य के जीवन को अशांत बनाते हैं, जबकि क्षमा, दया, करुणा एवं संयम जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं। संतों ने युवाओं को संस्कारों से जुडऩे, माता-पिता एवं गुरुजनों का सम्मान करने तथा नशामुक्त एवं सदाचारयुक्त जीवन अपनाने की प्रेरणा दी। प्रवचन के दौरान यह भी कहा गया कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसे केवल सांसारिक भोग-विलास में व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए, बल्कि धर्म आराधना, सेवा, तप एवं सत्कर्मों के माध्यम से आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए। धर्म ही वह शक्ति है जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, सहनशीलता एवं सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। संत भगवंतों ने समाज में एकता, प्रेम एवं परस्पर सद्भाव बनाए रखने का संदेश देते हुए कहा कि जब समाज धर्म और संस्कारों से जुड़ा रहता है, तब वहां सुख, शांति एवं समृद्धि बनी रहती है। प्रवचन के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरु भगवंतों से आशीर्वाद प्राप्त कर धर्म लाभ लिया। इस अवसर पर सकल जैन समाज सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

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