विनम्रता, आत्मसंयम और सदाचार ही जीवन को महान बनाते हैं : परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.

धमतरी. इतवारी बाजार स्थित पाश्र्वनाथाय जिनालय में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी महाराज साहब आदि ठाणा-4 के पावन सान्निध्य में चातुर्मासिक धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निरंतर जारी है। परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके चेहरे से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, संस्कार और विनम्रता से पहचाना जाता है। धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा कुछ समय के लिए सम्मान दिला सकते हैं, लेकिन स्थायी सम्मान केवल अच्छे आचरण और सदाचार से ही प्राप्त होता है। जिसने अपने व्यवहार को मधुर बना लिया, जिसने अपने मन को शांत बना लिया और जिसने अपने जीवन को धर्ममय बना लिया, वही वास्तव में सफल और महान कहलाने योग्य है। पूज्यश्री ने कहा कि आज का मनुष्य संसार की दौड़ में इतना व्यस्त हो गया है कि उसने स्वयं को पहचानना ही छोड़ दिया है। वह दूसरों से आगे निकलने का प्रयास करता है, लेकिन अपने भीतर झांकने का समय नहीं निकालता। जबकि भगवान महावीर का संदेश है कि सबसे पहले स्वयं को जीतो। जिसने अपने मन पर विजय प्राप्त कर ली, वही संसार का सबसे बड़ा विजेता है। बाहरी जीत क्षणिक होती है, लेकिन आत्मविजय शाश्वत होती है। पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने कहा कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ करना नहीं, बल्कि अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना है। यदि हमारी वाणी से किसी का दिल दुखता है, हमारे व्यवहार से किसी को पीड़ा पहुंचती है या हमारे कारण किसी जीव को कष्ट होता है, तो हमें आत्मचिंतन करना चाहिए। पूज्यश्री ने कहा कि क्रोध, लोभ, मोह और ईष्र्या मनुष्य के भीतर के ऐसे शत्रु हैं, जो उसके सुख और शांति को नष्ट कर देते हैं। क्रोध रिश्तों को तोड़ता है, लोभ संतोष छीन लेता है, मोह विवेक को समाप्त कर देता है और ईष्र्या मनुष्य को भीतर ही भीतर जलाती रहती है। इसलिए भगवान महावीर ने इन विकारों पर विजय प्राप्त करने का मार्ग बताया है। क्षमा, संतोष, त्याग और मैत्रीभाव ही इन विकारों का सबसे प्रभावी उपचार हैं।

