रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने धर्मसभा में कर्म सिद्धांत का मर्म समझाया, कहा—कर्मों से बचना नहीं, उन्हें समझकर आत्मशुद्धि की ओर बढऩा है

धमतरी। धर्मनगरी धमतरी के श्री पाश्र्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य प्रवर्तनी महोदया कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका निपूर्णा श्री जी म.सा. की सुशिष्या, प्रवचन प्रवीणा परम पूज्य स्नेहयशा श्री जी म.सा. की अंतेवासिनी परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा.आदि ठाणा-4 के सानिध्य में प्रतिदिन धर्मसभा एवं विभिन्न धार्मिक आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हो रहे हैं। धर्मसभा में परम पूज्य रत्ननिधि श्री जी म.सा. ने आओ समझें कर्मों की लीला विषय पर आध्यात्मिक एवं भावपूर्ण प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख-दु:ख, उतार-चढ़ाव और विभिन्न परिस्थितियां यूं ही नहीं आतीं। जैन दर्शन में प्रत्येक जीव के जीवन में घटने वाली परिस्थितियों के पीछे उसके कर्मों के सिद्धांत को महत्वपूर्ण माना गया है। उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर सुख मिलने पर स्वयं को उसका कारण मानता है और दुख आने पर दूसरों को दोष देने लगता है। लेकिन कर्म सिद्धांत हमें अपने भीतर देखने की प्रेरणा देता है। जैसे कर्म किए जाते हैं, उसी के अनुरूप उनके परिणामों का सामना करना पड़ता है।
कर्म दिखाई नहीं देते, लेकिन उनका प्रभाव दिखाई देता है
रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने समझाया कि कर्म आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन उनका प्रभाव मनुष्य के जीवन में दिखाई देता है। जिस प्रकार बीज दिखाई तो छोटा देता है, लेकिन समय आने पर उसी से विशाल वृक्ष बन जाता है, उसी प्रकार मनुष्य के विचार, भाव और कर्म भी भविष्य में अपना परिणाम देते हैं। उन्होंने कहा कि कर्म केवल हमारे हाथ-पैर से किए गए कार्यों का नाम नहीं है, बल्कि मन में उठने वाले भाव भी कर्मबंध का कारण बनते हैं। इसलिए केवल बाहरी व्यवहार को नहीं, बल्कि अपने भीतर के भावों को भी शुद्ध करना आवश्यक है।
भाव बदलेंगे तो कर्मों की दिशा बदलेगी
प्रवचन में उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है उसका भाव। एक ही कार्य अलग-अलग भावों से किया जाए तो उसका आध्यात्मिक प्रभाव भी अलग हो सकता है। इसलिए धर्म हमें केवल अच्छे कार्य करने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि शुद्ध भाव से अच्छे कार्य करने की सीख देता है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय मनुष्य को कर्मों के बंधन में बांधते हैं। वहीं क्षमा, विनय, सरलता, संतोष और करुणा जैसे भाव आत्मा को शुद्धता की ओर ले जाते हैं।
दु:ख आए तो दूसरों को दोष न दें
साध्वी श्री ने कहा कि जब जीवन में विपरीत परिस्थितियां आती हैं तो मनुष्य तुरंत किसी व्यक्ति या परिस्थिति को दोष देने लगता है। लेकिन ऐसे समय में एक बार स्वयं के भीतर भी झांकना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्म सिद्धांत हमें निराश करने के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का बोध कराने के लिए है। यदि हमारे कर्म हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं तो इसका अर्थ यह भी है कि आज किए जा रहे अच्छे कर्म हमारे भविष्य को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य कर सकते हैं।
कर्मों से डरना नहीं, कर्मों को समझना है
रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब ने कहा कि कर्मों की चर्चा का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं है। इसका उद्देश्य मनुष्य को जागरूक करना है कि वह अपने प्रत्येक विचार, शब्द और कार्य के प्रति सजग रहे। आज का भाव ही कल की दिशा तय करता है। इसलिए मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें, किसी को दुख पहुंचाने से बचें और प्रत्येक परिस्थिति में समता बनाए रखने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि जीवन में सुख आए तो अहंकार न हो और दु:ख आए तो निराशा न हो। दोनों परिस्थितियों में समभाव रखना ही आत्मिक साधना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।


