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शहर में छाने लगी दीपावली पर्व की खुमारी : शुरु हुई गौरा-गौरी जगाने की रस्म

शहर के सभी वार्डो सहित ग्रामीण क्षेत्रो में गोवर्धन पूजा के दिन हर्षोल्लास से निकाली जाती है गौरा-गौरी की बारात


धमतरी। दीपावली पर्व पर गांव के साथ शहर में गौरा-गौरी पूजन की परंपरा सदियों से चली आ रही है। मंगलवार से शहर के कई वार्डो में गौरा चौरा पहुंचकर बाजे-गाजे के साथ गौरा-गौरी को जगाने की रस्म शुरु की गई। दीपावली के दिन गौरा-गौरी की स्थापना की जाएगी। और गोवर्धन पूजा के दिन गौरा-गौरी की बारात निकालकर विसर्जन विधि-विधान से किया जाएगा। शहर के आमापारा, कोष्टापारा, ब्राम्हणपारा, जालमपुर, विंध्यवासिनी वार्ड, सोरिद, हटकेशर, गोकुलपुर सहित शहर के सभी वार्डो में गौरा-गौरी पर्व मनाया जाता है।
गौरा गौरी पर्व मनाने की शुरुआत वैसे तो धनतेरस से होती है। लेकिन शहर के कई वार्डो में कुछ दिन पहले ही गौरा जगाने की रस्म शुरु हो गई। गौरा चौरा में शाम ढलने के बाद गौरा समिति से जुड़े लोग बाजे-गाजे के साथ पहुंचते हैं। फिर पूजा कर गीत गाकर गौरा-गौरी जगाने की रस्म की जाती है। फिर गौरा-गौरी की मूर्ति को विधिविधान से स्थापित कर पूजन किया जाता है। परंपरानुसार दीपावली पर्व के दूसरे दिन गौरा गौरी मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। यह उत्सव दीपावली और लक्ष्मी पूजा के बाद, कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष अमावस्या पर मनाया जाता है। गौरा-गौरी की मूर्तियों को फूलों और दीपों से सजाया जाता है। दीपावली की रात्रि को वास्तविक विवाह की तरह सभी रस्में निभाई जाती हैं। गौरा की तरफ से बारात गौरी के घर जाती है और गौरी के पक्ष से उसका स्वागत किया जाता है। ग्रामीण एकत्र होकर गौरा गीत गाते हैं और आदिवासी समाज की महिलाएं भी इस उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं।

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