किसी भी परिस्थिति पर जब स्वीकार का भाव आ जाए तो वह आनंद का कारण बन जाता है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.
चातुर्मास के तहत ईतवारी बाजार स्थित पाश्र्वनाथ जिनालय में रोजाना जारी है प्रवचन

धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि चातुर्मास काल में सत्संग के समागम में एक विशेष प्रयोजन से जुड़े है। दो चीजे होती है जीवन में विकास करना और जीवन का विकास करना। जीवन में विकास करने पर अधिकतम वह एक ही भव के लिए होता है। किंतु जीवन का विकास भव भव का विकास होता है। जीवन में विकास शरीर के लिए होता है जबकि जीवन का विकास आत्मा के लिए होता है। परमात्मा कहते है कि एक बात इतना पुरुषार्थ कर लो कि जीवन का विकास हो जाए फिर सभी लक्ष्य सरलता से प्राप्त हो सकते है। 18 पाप स्थानकों में पहला अध्याय है विनय श्रुत। इस सूत्र का दूसरा अध्याय है परिषह प्रविभक्ति। किसी व्यक्ति, वस्तु से प्रभावित न होना ही जय-विजय कहलाता है। जय एक युद्ध है और उस युद्ध पर सफलता प्राप्त करके आनंद मनाना विजय है। किसी भी परिस्थिति पर जब स्वीकार का भाव आ जाए तो वह आनंद का कारण बन जाता है। जीवन में दु:ख आने का कारण मन के अनुसार परिस्थितियों का न होना है। अर्थात परिस्थितियों को स्वीकार न करना ही दुख का कारण है । स्वीकार भाव सुख का कारण और प्रतिकार भाव दुख का कारण बनता है। हम परिस्थिति को नहीं बदल सकते किंतु उसे स्वीकार किया जा सकता है। और परिस्थिति को स्वीकार करने वाला ही सुखी हो सकता है । संसार में दो प्रकार के लोग होते है दुर्जन अर्थात अवगुणी तथा सज्जन अर्थात गुणी । दुर्जन और सज्जन दोनों के साथ एक जैसा व्यवहार करना चाहिए।
चातुर्मास के तहत जैन समाजजनों द्वारा किया जा रहा उपवास
चातुर्मास के तहत जैन समाजजनों द्वारा लगातार उपवास का क्रम जारी है। जिसमें समाज के बच्चे, महिला-पुरुष सभी वर्ग के लोग शामिल है। इसी कड़ी में धर्मेंद्र पिता लूनकरण गोलछा के 12 उपवास व अनमोल पिता अनिल बैद के 9 उपवास की आज पारणा रही।
