Uncategorized

भगवान महावीर के जीवन का एक एक प्रसंग श्रवणीय, वंदनीय और पूज्यनीय है – परम पूज्य प्रशम सागर जी म.सा.


धमतरी। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर अध्यात्मयोगी महेंद्र सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी स्वाध्याय प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब परम पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब श्री पाश्र्वनाथ जिनालय इतवारी बाजार धमतरी में विराजमान है। आज परम पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि परमात्मा अपने लिए स्वयं नियम बनाते है और पालन भी करते है। परमात्मा स्वयं गुरु भी होते है और स्वयं शिष्य भी होते है। परमात्मा नेतृत्वकर्ता है। और जो जीव परमात्मा के नेतृत्व को स्वीकार कर लेता है उसके जीवन का उद्धार निश्चित होता है। भगवान महावीर 30 वर्ष की आयु में संयम जीवन स्वीकार कर लेते है। उसके बाद साढ़े बारह वर्ष छदमस्त अर्थात साधना में रहते है। इस काल में साधना करते हुए अपने कर्मों को उदय में लाकर उसका उपशम करते है। इस छदमस्त काल में परमात्मा को अनेक उपसर्ग सहन करना पड़ता है। 24 तीर्थंकरों में भगवान महावीर सबसे कम आयु के तीर्थंकर हुए लेकिन सबसे अधिक उपसर्ग भी आपने ही सहन किया। भगवान महावीर के जीवन का एक एक प्रसंग श्रवणीय और वंदनीय और पूज्यनीय है। परमात्मा अपने साधना काल में अर्थात छदमस्त काल में शरीर की सुश्रुषा का त्याग करते है। हम संसार में किसी को भी साधन, सुविधा और संपत्ति से जानने पहचानने का प्रयास करते है । जबकि महापुरुष अपने व्यक्तित्व अर्थात आचरण से और साधना से पहचाने जाते है। ज्ञानी कहते है संसार के सभी जीवो के प्रति परमात्मा के हृदय में करुणा का भाव होता है। संसार के सभी जीव के लिए परमात्मा के हृदय में मां जैसी ममता होती है। भगवान महावीर ने साढ़े बारह वर्ष साधनाकाल अर्थात छदमस्त अवस्था में केवल 365 दिन आहार लिया। साथ ही लगातार 2 दिन आहार नहीं लिया। इस काल में केवल 2 घड़ी अर्थात 48 मिनट परमात्मा को नींद आई। ऐसे परमात्मा महावीर को ऋजूबालिका नदी के तट पर गोदुग्ध आसान में केवलज्ञान प्राप्त हुआ। जो आत्मा छपक श्रेणी की ओर आगे बढ़ता है उनको ही शुक्लज्ञान प्राप्त होता है। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद शमवशरण की रचना देवो द्वारा की जाती है। इस शमवशरण में बैठकर परमात्मा जीवमात्र के कल्याण के लिए देशना देते है। परमात्मा अपने अंतिम समय में पावापुरी में हस्तिपाल राजा की जीर्णशाला में पधारते है। यहां पर कार्तिक वदी अमावस्या के दिन निर्वाण हो जाता है। अब परमात्मा कभी भी इस संसार में पुन: लौटकर नहीं आयेंगे
तपस्या का क्रम है जारी
चातुर्मास के तहत तपस्या का क्रम जारी है जिसमें मानसी बरडिया सुपुत्री अभय बरडिया 15 उपवास, श्रुति बरडिया सुपुत्री संजय बरडिया 09 उपवास, अभिषेक सुपुत्र निर्मल श्रीश्री माल 08 उपवास , मधु धर्मपत्नीआशीष डागा 08 उपवास, श्रीमती राखी धर्मपत्नी स्व. संजय संकलेचा 07 उपवास, श्रीमती सुशीला धर्मपत्नी धनपत बरडिया 07 उपवास, स्नेहा सुपुत्री निर्मल श्री श्री माल 07 उपवास, श्रीमती रेखा धर्मपत्नी राजेंद्र गोलछा 07 उपवास, श्रीमती पूजा अंकित छाजेड़ 09 उपवास, शिशिर सेठिया सुपुत्र महेश सेठिया 07 उपवास, दिव्य सुपुत्र गौरेश शाह 06 उपवास, चेतन सुपुत्र महेश बरडिया 10 उपवास शामिल है।

Ashish Kumar Jain

Editor In Chief Sankalp Bharat News

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!